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चरमराई सफाई व्यवस्था को पटरी पर लाने के लिए प्रशासन ने कसी कमर
हावड़ा। प्रसिद्ध औद्योगिक नगरी हावड़ा इन दिनों कचरे के भारी संकट, असहनीय दुर्गंध और बदहाल जलनिकासी व्यवस्था के कारण बेहद बुरे दौर से गुजर रही है। शहर के रिहायशी इलाकों से लेकर मुख्य सड़कों तक पर लगे कूड़े के विशाल ढेर ने आम नागरिकों का जीना मुहाल कर दिया है। लंबे समय से नगर निगम चुनाव न होने और बुनियादी सफाई ढांचे में बड़ी खामियों के चलते स्थिति लगातार नियंत्रण से बाहर होती चली गई। हालांकि, सूबे में नई सरकार के गठन के बाद अब स्थानीय जनप्रतिनिधियों और प्रशासनिक अमले ने इस गंभीर संकट से निपटने के लिए जमीनी स्तर पर सक्रियता दिखाई है।
बेलगाछिया डंपिंग ग्राउंड के धंसाव से बिगड़े हालात
हावड़ा नगर क्षेत्र में घर-घर से कचरा उठाने की व्यवस्था तो लागू है, लेकिन इसके निस्तारण का तंत्र पूरी तरह ध्वस्त हो चुका है। नियम के मुताबिक कचरे को स्थानीय वैट (संग्रह केंद्रों) से उठाकर मुख्य डंपिंग ग्राउंड ले जाना होता है, परंतु समय पर इसकी निकासी न होने से यह कूड़ा अब सड़कों तक फैलने लगा है। रही-सही कसर बेलगाछिया डंपिंग ग्राउंड के एक हिस्से में हुए धंसाव ने पूरी कर दी, जिसके बाद हावड़ा का कचरा प्रबंधन पूरी तरह चरमरा गया। वर्तमान में शहर के एक बड़े हिस्से का कूड़ा कोलकाता के धापा और बैद्यबाती के डंपिंग ग्राउंड में भेजा जा रहा है। सरकारी आंकड़ों की मानें तो हावड़ा नगर क्षेत्र में प्रतिदिन करीब 910 मीट्रिक टन भारी-भरकम कचरा पैदा होता है, जिसका सामना करने में मौजूदा तंत्र पूरी तरह हांफ रहा है।
संसाधनों और कर्मचारियों की भारी किल्लत से जूझ रहा निगम
इस भीषण संकट के पीछे संसाधनों की भारी कमी एक मुख्य वजह बनकर उभरी है। इतने बड़े शहर में कचरा ढोने के लिए नगर निगम के बेड़े में महज 13 ट्रैक्टर और 33 ट्रक ही उपलब्ध हैं। वहीं, पूरे नगर क्षेत्र में केवल 1,616 कचरा डिपो हैं, जो आबादी के अनुपात में बेहद कम हैं। संसाधनों के साथ-साथ कंजर्वेंसी विभाग में मैनपावर यानी कर्मचारियों का भारी टोटा है, जिसका सीधा असर रोजाना होने वाले डोर-टू-डोर कचरा कलेक्शन और समय पर उसके निस्तारण पर पड़ रहा है।
नालियों के जाम होने से जलभराव का खतरा
शहर के चटर्जीहाट, कदमतला, पंचाननतला, सालकिया, शिवपुर और टिकियापाड़ा जैसे प्रमुख क्षेत्रों में स्थिति सबसे ज्यादा चिंताजनक बनी हुई है। इसके अलावा वार्ड संख्या 6, 7, 9, 49 और 50 में कचरे के साथ-साथ जलभराव की दोहरी मार पड़ रही है। स्थानीय निवासियों की शिकायत है कि सड़कों पर बिखरा कचरा हवा और पानी के साथ बहकर नालियों में समा जाता है, जिससे पूरा ड्रेनेज सिस्टम चोक हो गया है। खुले नाले और जगह-जगह अवैध रूप से चल रहे खटाल इस समस्या को और ज्यादा पेचीदा बना रहे हैं, जिसके कारण आने वाले मॉनसून में भारी जलभराव का खतरा मंडराने लगा है।
बंद गाडिय़ों और कम्पैक्टर का लिया जाएगा सहारा
इस संकट का स्थाई समाधान खोजने के लिए हावड़ा नगर निगम मुख्यालय में एक उच्चस्तरीय आपात बैठक बुलाई गई, जिसमें शहर की सूरत बदलने के लिए कई अहम तकनीकी बदलावों पर मुहर लगाई गई। नई कार्ययोजना के तहत अब सड़कों पर खुले वाहनों में कचरा नहीं ढोया जाएगा, बल्कि उनकी जगह बंद बॉक्स वाले आधुनिक वाहनों को चरणबद्ध तरीके से बेड़े में शामिल किया जाएगा। विभिन्न संवेदनशील इलाकों में टिपर वैन तैनात किए जाएंगे, जहाँ घरों से निकला कचरा सीधे डंप होगा। इसके अलावा शहर में जगह-जगह मोवेबल कम्पैक्टर मशीनें लगाई जाएंगी, जो कचरे को कंप्रेस कर कम जगह में सुरक्षित तरीके से संग्रहित करेंगी। योजना में खुले वैट को पूरी तरह हटाने, नालियों की रोस्टर के तहत सफाई और गीले-सूखे कचरे को अलग-अलग करने (पृथक्करण) पर विशेष जोर दिया गया है। साथ ही सफाई विभाग में खाली पड़े पदों पर बहाली की प्रक्रिया भी तेज की जाएगी।
सत्ता और विपक्ष आए एक साथ
हावड़ा को इस बदहाली से निकालने के लिए अब राजनीतिक इच्छाशक्ति भी दिखाई देने लगी है। उत्तर हावड़ा के विधायक और राज्य मंत्री उमेश राय ने जनता को आश्वस्त करते हुए कहा कि शहर को इस गंदगी से मुक्ति दिलाने के लिए हर हाल में आधुनिक कचरा प्रबंधन प्रणाली लागू की जाएगी।
उन्होंने विभाग में नई नियुक्तियों और सफाई अभियानों को युद्ध स्तर पर चलाने की बात कही। दूसरी ओर, विपक्ष ने भी इस मुद्दे पर सकारात्मक रुख अपनाया है। पूर्व विधायक गौतम चौधरी ने नई सरकार को इस दिशा में पूरा सहयोग देने का भरोसा देते हुए कहा कि अतीत में वित्तीय संकट के चलते कई जरूरी परियोजनाएं ठप हो गई थीं, लेकिन अब शहर के हित में सभी पक्षों को दलगत राजनीति से ऊपर उठकर एकजुट होना होगा।
प्रशासनिक दावों और इस राजनीतिक एकजुटता के बीच अब हावड़ा के नागरिकों को उम्मीद है कि यह कार्ययोजना कागजों से निकलकर जल्द धरातल पर उतरेगी और उन्हें एक स्वच्छ व प्रदूषण-मुक्त माहौल मिल सकेगा।